ऋषिकेश। बागेश्वर धाम की पावन धरती दिव्यता, आस्था और मानवीय संवेदनाओं से आलोकित हो उठी। आचार्य श्री धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री जी के मार्गदर्शन, नेतृत्व व आशीर्वाद से आयोजित सप्तम कन्या विवाह महामहोत्सव ने एक नया इतिहास रच दिया। कन्या विवाह महोत्सव के इस विराट आयोजन में अनेकों श्रद्धालुओं, पूज्य संतों, समाजसेवियों, आठ देशों के राजदूतों और देश-विदेश से आए गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति ने इसे वास्तव में “बुंदेलखंड महाकुंभ” का स्वरूप प्रदान किया।
यह सामूहिक विवाह महोत्सव भारतीय संस्कृति के मूल तत्व, संस्कार, सेवा और समर्पण का जीवंत उदाहरण बनकर उभरा। अनेकों कन्याओं का वैदिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह संपन्न हुआ। यहां से हर बेटी को सम्मान, सुरक्षा और आत्मसम्मान का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, हवन, पूजा और मंगल गीतों के बीच संपन्न हुए इन विवाहों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
इस ऐतिहासिक अवसर पर आध्यात्मिक चेतना के अग्रदूत, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती, विदेश यात्रा से सीधे बागेश्वर धाम पहुँुचे, उन्होंने नवदंपत्तियों को आशीर्वाद व शुभकामनायें दी।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने प्रेरणादायी संदेश में कहा कि कन्या का विवाह केवल एक पारिवारिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज निर्माण का आधार है। जब समाज मिलकर बेटियों के भविष्य की जिम्मेदारी लेता है, तब वह वास्तव में राष्ट्र निर्माण करता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में कन्या को देवी स्वरूप माना गया है और ऐसे आयोजनों से समाज में समानता, करुणा और सहयोग की भावना प्रबल होती है। यह केवल कन्यादान नहीं, बल्कि मानवता के प्रति कर्तव्य है।
आचार्य श्री धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री जी स्वयं इन बेटियों के धर्मपिता बनकर उन्हें ससम्मान विदा कर रहे हैं यह वास्तव में द्रवित करने वाला क्षण है।
कन्या विवाह महोत्सव में पूज्य संत-महात्माओं के साथ-साथ विभिन्न देशों के राजदूतों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने आयोजन को वैश्विक पहचान प्रदान की। विदेशी अतिथियों ने भारतीय परंपराओं की इस अनूठी सामाजिक पहल की सराहना करते हुए इसे प्रेरणास्रोत बताते हुये कहा कि जिस प्रकार बागेश्वर धाम सरकार ने एकजुट होकर हजारों कन्याओं के विवाह का दायित्व उठाया है, वह वैश्विक मानवता के लिए एक आदर्श मॉडल है।
पूरे परिसर को भव्य व दिव्य रूप से सजाया गया था। फूलों की सजावट, पारंपरिक मंडप, विशाल यज्ञशालाएँ और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने वातावरण को उत्सवमय बना दिया। स्वयंसेवकों ने सेवा भाव से भोजन, जल और अन्य व्यवस्थाओं की अद्भुत जिम्मेदारी संभाली। अनेकों श्रद्धालुओं के बावजूद अनुशासन और व्यवस्था का अद्भुत उदाहरण देखने को मिला।
नवविवाहित दंपत्तियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आशीर्वाद के साथ आवश्यक सहयोग भी प्रदान किया गया। यह आयोजन सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक ठोस कदम है।
यह सप्तम कन्या विवाह महोत्सव इस बात का प्रमाण है कि जब समाज, संत और सेवा की भावना एक साथ आते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है। यह आयोजन केवल बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है, एक ऐसा संदेश कि बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि राष्ट्र की शक्ति हैं।
निस्संदेह, यह ऐतिहासिक महोत्सव आने वाले वर्षों तक सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक गौरव और मानवीय करुणा का प्रतीक बना रहेगा। बुंदेलखंड की यह दिव्य गाथा भारतीय संस्कृति की अमर परंपरा को नई ऊर्जा देती है और संपूर्ण समाज को एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान करती है।
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